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गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के संस्थापक एवं महान शिक्षाविद् स्वामी श्रद्धानन्द जी की जयंती पर परमार्थ निकेतन में विश्वशान्ति हवन किया गया

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन आज में आज गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के संस्थापक एवं महान शिक्षाविद् स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती जी की जयंती पर श्रद्धाजंलि सभा एवं विश्वशांति हवन का आयोजन किया गया।

श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती जी ने कहा कि उन्होंने स्वदेश, स्वसंस्कृति, स्वसमाज, स्वभाषा, स्वशिक्षा, नारी कल्याण, दलितोत्थान, स्वदेशी प्रचार, वेदोत्थान, कुरीतियों का खण्डन, अन्धविश्‍वास-उन्मूलन और धर्मोत्थान के कार्यों के लिये पूर्णतः अपना जीवन समर्पित किया।

परमार्थ निकेतन में योग के माध्यम से पांच दिवसीय जीवन परिवर्तन कार्यक्रम में हिंदुजा कॉलेज ऑफ कॉमर्स के तीस से अधिक प्रोफेसर्स और प्रिंसिपल ने सहभाग किया। उन्होंने स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी से मुलाकात करने के बाद आशीर्वाद लिया। उन्होंने स्वामी जी से विभिन्न आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। स्वामी जी उन्हें अर्थ (धन) प्रबंधन के साथ ही अर्थ (धरती) प्रबंधन हेतु भी प्रेरित किया।

स्वामी जी ने कहा कि स्वामी श्रद्धानंद जी की जीवनी आज के युग में प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक युवा के लिए अत्यंत प्रेरणादायी है। स्वामी श्रद्धानंद जी उन महापुरुषों में से एक थे जिन्होंने अपने राष्ट्र व धर्म के लिये अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। वैदिक संस्कारों की पुनर्स्थापना हेतु उन्होंने घर-घर जाकर धन एकत्र कर उन्होंने हरिद्वार में गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय की स्थापना की।

स्वामी श्रद्धानंद जी मानते थे कि जिस समाज और देश में शिक्षक स्वयं चरित्रवान नहीं होते, उसकी दशा अच्छी नहीं हो सकती। उनका कहना था कि हमारे यहां टीचर हैं, प्रोफेसर हैं, प्रिसिंपल हैं, उस्ताद हैं, मौलवी हैं पर आचार्य नहीं हैं. आचार्य अर्थात् आचारवान व्यक्ति, सदाचारी वक्तियों की इस समाज को अत्यंत आवश्यकता है। चरित्रवान व्यक्तियों के अभाव में महान से महान व धनवान से धनवान राष्ट्र भी समाप्त हो जाते हैं, इसलिये संस्कार, मूल और मूल्यों की अत्यंत आवश्यकता है।

जात-पात व ऊंच-नीच के भेदभाव से उपर उठकर उन्होंने समग्र समाज के कल्याण के लिए अनेक कार्य किए। उन्होंने दिखा दिया कि शुभकार्य का प्रारंभ स्वयं से किया जाना चाहिये और इस कथन को सार्थक करने के लिये उन्होंने प्रबल सामाजिक विरोधों के बावजूद अपनी बेटी अमृत कला, बेटे हरिश्चद्र व इंद्र का विवाह जात-पात के समस्त बंधनों को तोड़ कर कराया. उनका विचार था कि छुआछूत ने इस देश में अनेक जटिलताओं को जन्म दिया है तथा वैदिक वर्ण व्यवस्था द्वारा ही इसे समाप्त किया जा सकता है।

वे हिन्दी को राष्ट्र भाषा और देवनागरी को राष्ट्र-लिपि के रूप में अपनाने के पक्षधर थे। सतधर्म प्रचारक नामक पत्र उन दिनों उर्दू में छपता था. एक दिन अचानक ग्राहकों के पास जब यह पत्र हिंदी में पहुंचा तो सभी दंग रह गए क्योंकि उन दिनों उर्दू का ही चलन था. त्याग व अटूट संकल्प के धनी स्वामी श्रद्धानन्द ने 1868 में यह घोषणा की कि जब तक गुरुकुल के लिए 30 हजार रुपये इकट्ठे नहीं हो जाते तब तक वह घर में पैर नहीं रखेंगे. इसके बाद उन्होंने भिक्षा की झोली डाल कर न सिर्फ घर-घर जाकर 40 हजार रुपये इकट्ठे किए इस प्रकार का उनका गुरूकुल कांगड़ी बनाने के पीछे समर्पण था। गुरूकुल के पीछे उनका अटूट प्रेम व सेवा भाव अद्भुत व अविस्मरणीय है। आज उसी के दर्शन हमें इस दिव्य संस्था के रूप में हो रहे है।

आज की परमार्थ गंगा आरती स्वामी श्रद्धानन्द जी को समर्पित की गयी।

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